किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
मुझको अहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

(रंजिश : animosity; अहसास : realisation; ज़िंदा : alive)

मेरे रुकने से मेरी साँस भी रुक जाएँगी
फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

(साँस : breath; फ़ासले : distance)

ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालों
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

(ज़हर : poison; ज़मानेवालो : people)

चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है ‘फ़ाकिर’
भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

सुदर्शन फ़ाकिर

साभार : Ghazal Lyrics

One Response to “किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी”

  1. Neelabh Says:

    it is one of the best in my collections which is able to show ur inner feelings with ease to…

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