किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
मुझको अहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
(रंजिश : animosity; अहसास : realisation; ज़िंदा : alive)
मेरे रुकने से मेरी साँस भी रुक जाएँगी
फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
(साँस : breath; फ़ासले : distance)
ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालों
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
(ज़हर : poison; ज़मानेवालो : people)
चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है ‘फ़ाकिर’
भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
सुदर्शन फ़ाकिर
साभार : Ghazal Lyrics
December 21st, 2006 at 8:48 pm
it is one of the best in my collections which is able to show ur inner feelings with ease to…