Archive for the ‘Tariq Badayuni’ Category

एक ना एक शम्मा जलाये रखिये

Monday, August 7th, 2006

एक ना एक शम्मा अन्धेरे में जलाये रखिये
सुब्ह होने को है माहौल बनाये रखिये

(शम्मा : lamp, candle-light; सुब्ह : morning; माहौल : environment)

जिन के हाथों से हमें ज़ख्म-ए-निहाँ पहुँचे हैं
वो भी कहते हैं के ज़ख्मों को छुपाये रखिये

(ज़ख्म-ए-निहाँ : concealed wounds)

कौन जाने के वो किस राह-गुज़र से गुज़रे
हर गुज़र-गाह को फूलों से सजाये रखिये

(राह-गुज़र : pathway; गुज़र-गाह : pathway)

दामन-ए-यार की ज़ीनत ना बने हर आँसू
अपनी पलकों के लिए कुछ तो बचाये रखिये

(दामन-ए-यार : lap of the beloved; ज़ीनत : ornament, decoration)

तारिक़ बदायूँनी