Archive for the ‘Sudarshan Faakir’ Category

इश्क में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने ना दिया

Saturday, August 26th, 2006

इश्क में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने ना दिया
वरना क्या बात थी किस बात ने रोने ना दिया

(ग़ैरत-ए-जज़्बात : pride of the emotions)

आप कहते थे के रोने से ना बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने ना दिया

रोने वालों से कह दो उनका भी रोना रो लें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने ना दिया

(मजबूरी-ए-हालात : constraints)

तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तन्गी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने ना दिया

(तन्गी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात : scarcity of the time of meeting)

सुदर्शन फ़ाकिर

ग़म बढे आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह

Friday, August 11th, 2006

ग़म बढे आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह
तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह

(ग़म : sorrows; क़ातिल : murderer; निगाहें : eyes)

अपनी नज़रों में गुनहगार न होते, क्यों कर
दिल ही दुश्मन हैं मुखालिफ़ के गवाहों की तरह

(नज़रों : eyes; गुनहगार : sinful; मुखालिफ़ : opposition, enemy; गवाहों : witnesses)

हर तरफ़ ज़ीस्त की राहों में कड़ी धूप है दोस्त
बस तेरी याद का साया है पनाहों की तरह

(ज़ीस्त : life; साया : shade; पनाहों : refuge)

जिनके ख़ातिर कभी इल्ज़ाम उठाए, ‘फ़ाकिर’
वो भी पेश आए हैं इन्साफ़ के शाहों की तरह

(ख़ातिर : for the sake; इल्ज़ाम : accusations; इन्साफ़ : justice; शाह : king)

सुदर्शन फ़ाकिर

साभार: गीतायन

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

Thursday, August 10th, 2006

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
मुझको अहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

(रंजिश : animosity; अहसास : realisation; ज़िंदा : alive)

मेरे रुकने से मेरी साँस भी रुक जाएँगी
फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

(साँस : breath; फ़ासले : distance)

ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालों
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

(ज़हर : poison; ज़मानेवालो : people)

चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है ‘फ़ाकिर’
भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

सुदर्शन फ़ाकिर

साभार : Ghazal Lyrics